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Sunday, November 27, 2022

पंजाब: डील हुआ फाइनल, 27 साल बाद BSP के साथ चुनाव लड़ेगी अकाली दल

नई दिल्ली। उत्तर प्रेदश के बाद अब पंजाब की राजनीति में जबरदस्त सियासी हलचल मची हुई है। अगले साल यहां विधानसभा चुनाव होने है, ऐसे में सारी राजनीतिक पार्टियां काफी एक्टिव हो गई है, तो वहीं पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह चौतरफा घिरते नजर आ रहे है। एक तरफ जहां उनके ही पार्टी के नेता और पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल रखा है तो दूसरी तरफ शिरोमणि अकाली दल (SAD) और बहुजन समाज पार्टी (BSP) के बीच गठबंधन से कांग्रेस पार्टी की मुश्किलें काफी हद तक बढ़ सकती हैं।

आपको बता दें कि अगले साल पंजाब में विधानसभा चुनाव शिरोमणि अकाली दल और बहुजन समाज पार्टी दोनों एक साथ मिलकर लड़ेंगे। काफी वक्त से चल रही बातचीत के बाद दोनों दलों के बीच गठबंधन की आज आधिकारिक घोषणा हो गई। घोषणा के दौरान शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर बादल ओर बहुजन समाज पार्टी के महासचिव सतीश मिश्रा मौजूद रहे। खबर के मुताबिक दोनों दलों के बीच सीटों का भी बटवारा हो गया है। बासपा जहां BSP राज्य की 20 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। तो वहीं शिरोमणि अकाली दल और बाकी सीट (97) पर चुनाव लड़ती नजर आएंगी।

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दोनों पार्टी गरीब-किसान के लिए लड़ती

शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर बादल ने गठबंधन के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती का आभार वयक्त किया और कहा कि दोनों पार्टियों की सोच एक सामान मिलती है, हमेशा से दोनों पार्टियां गरीब ,किसान और  मजदूर के हक के लिए लड़ती आई है। इतना ही नहीं सुखबीर बादल ने ये भी कहा कि ‘आज का दिन पंजाब की सियासत में नया दिन है और आने वाली विधानसभा चुनाव में हमारी पार्टी एक नया अध्याय लिखेंगी।

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दलितों पर खास नजर

आपको बता दें कि पंजाब में करीब 33 प्रतिशन दलित वोट है, ऐसे तमाम पार्टियों की नजर दलित वोटरों को रिझाने पर लगी है। मीडिया रिपोर्ट की मानें तो अभी तक दलित वोट आमतौर पर कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल के बीच बंटता रहा है। हालांकि यहां कई बार बीएसपी ने इसमें सेंध लगाने की कोशिश की है, लेकिन कामयाब नहीं हो पाई। लेकिन साल 2017 के चुनाव में दलित के कुछ वोट आम आदमी पार्टी के हिस्से में आए थे, ऐसे में अब सभी पार्टियाों की नजर दलित वोटरों पर है।

इससे पहले इस साल अप्रैल में सुखबीर सिंह बादल ने दलित वोटरों को अपनी तरफ करने के लिए यहां तक बोल दिया कि अगर उनकी पार्टी पंजाब में आगामी विधानसभा चुनाव में सरकार बनाती है तो डिप्टी सीएम दलित समुदाय से होगा। बता दें कि अकाली दल का इससे पहले भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन था लेकिन किसान आंदोलन के चलते बीजेपी के साथ गठबंधन तोड़ लिया था।

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मायावती कांग्रेस से क्यों नहीं की गठबंधन

पंजाब की राजनीति में 27 साल बाद एक बार फिर मायावती की बसपा और सुखबीर बादल का अकाली दल एक साथ चुनाव लड़ने जा रहा है। पंजाब में अभी कांग्रेस की सरकार है, ऐसे में मायावती का कांग्रेस के साथ गठबंधन न करके अकाली दल के साथ गठबंधन की है। आपको बता दें कि कांग्रेस के साथ मायावती का गठबंधन नहीं करने के पीछे कुछ वजह है। दरअसल राजस्थान विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए बसपा ने समर्थन दिया था। लेकिन सरकार बनने के कुछ ही दिनों बाद राजस्थान सीएम अशोक गोहलोत ने बसपा पार्टी के सभी 6 विधायकों को तोड़ कर अपने पार्टी में शामिल करा लिया था, इससे बसपा सुप्रीमों काफी नाराज हो गई थी। तो वहीं दूसरी तरफ अकाली दल किसान आंदोलन के चलते एनडीए से नाता तोड़ लिया था। ऐसे में अकाली दल और बसपा दोनों को एक मजबूत गठबंधन की तलाश था, जो अब पूरा हो गया। लेकिन अब ये देखना दिलचस्प हो गया है कि आगामी चुनाव में दोनों पार्टियां एक-दूसरे के लिए कितना फायदेमंद होती है।

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27 साल बाद फिर एक साथ!

पंजाब में बहुजन समाज पार्टी पिछले 25 सालों से विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव लड़ती आ रही है, लेकिन पार्टी को राज्य में कभी भी बड़ी जीत हासिल नहीं हो पाई। ऐसे में अकाली दल से बसपा का गठबंधन कहा तक फायदा पहुंचाती है ये आने वाला समय ही बताएगा। आपको बता दें कि ये कोई पहला मौका नहीं जब बसपा और अकाली दल एक साथ चुनाव लड़ रहे है। इससे पहले दोनों दल 1996 में एक साथ लोकसभा चुनाव लड़े थे, तब मायावती के नेतृत्व वाली बसपा ने तीन सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि अकाली दल ने 10 में से आठ सीटों पर जीत दर्ज की थी।

Priya Tomar
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I am Priya Tomar working as Sub Editor. I have more than 2 years of experience in Content Writing, Reporting, Editing and Photography .

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